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بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ

बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम

  1. 1 صۤۚ وَٱلۡقُرۡءَانِ ذِی ٱلذِّكۡرِ

    साद वल कुरआन ज़ी अल-ज़िक्रि

    सआद नसीहत करने वाले कुरान की क़सम (तुम बरहक़ नबी हो)

  2. 2 بَلِ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ فِی عِزَّةࣲ وَشِقَاقࣲ

    बले अल्लाज़ीना कफ़रू फ़े इज़्ज़त वशिकाक

    मगर ये कुफ्फ़ार (ख्वाहमख्वाह) तकब्बुर और अदावत में (पड़े अंधे हो रहें हैं)

  3. 3 كَمۡ أَهۡلَكۡنَا مِن قَبۡلِهِم مِّن قَرۡنࣲ فَنَادَوا۟ وَّلَاتَ حِینَ مَنَاصࣲ

    कम मिन मिन क़र्न वलाता हय्न मनास

    हमने उन से पहले कितने गिरोह हलाक कर डाले तो (अज़ाब के वक्त) ये लोग चीख़ उठे मगर छुटकारे का वक्त ही न रहा था

  4. 4 وَعَجِبُوۤا۟ أَن جَاۤءَهُم مُّنذِرࣱ مِّنۡهُمۡۖ وَقَالَ ٱلۡكَـٰفِرُونَ هَـٰذَا سَـٰحِرࣱ كَذَّابٌ

    वा-अजिबुआ अन जाआहुम मुन्ज़िर व काला अल-काफिरून हाज़ा साहिर कज़्ज़ाबुन

    और उन लोगों ने इस बात से ताज्जुब किया कि उन्हीं में का (अज़ाबे खुदा से) एक डरानेवाला (पैग़म्बर) उनके पास आया और काफिर लोग कहने लगे कि ये तो बड़ा (खिलाड़ी) जादूगर और पक्का झूठा है

  5. 5 أَجَعَلَ ٱلۡـَٔالِهَةَ إِلَـٰهࣰا وَ ٰ⁠حِدًاۖ إِنَّ هَـٰذَا لَشَیۡءٌ عُجَابࣱ

    अजाला अल-इलाहता इलाह और विश्वास हेदान इन्ना हाज़ा लशयउन उजाब

    भला (देखो तो) उसने तमाम माबूदों को (मटियामेट करके बस) एक ही माबूद क़ायम रखा ये तो यक़ीनी बड़ी ताज्जुब खेज़ बात है

  6. 6 وَٱنطَلَقَ ٱلۡمَلَأُ مِنۡهُمۡ أَنِ ٱمۡشُوا۟ وَٱصۡبِرُوا۟ عَلَىٰۤ ءَالِهَتِكُمۡۖ إِنَّ هَـٰذَا لَشَیۡءࣱ یُرَادُ

    वंतलक़ा अलमाला मिन्हुम अनी एमशुआ वा-स-बि-रू अलीहतिकुम इन्ना हाज़ा लशयुन यूरादू

    और उनमें से चन्द रवादार लोग (मजलिस व अज़ा से) ये (कह कर) चल खड़े हुए कि (यहाँ से) चल दो और अपने माबूदों की इबादत पर जमे रहो यक़ीनन इसमें (उसकी) कुछ ज़ाती ग़रज़ है

  7. 7 مَا سَمِعۡنَا بِهَـٰذَا فِی ٱلۡمِلَّةِ ٱلۡـَٔاخِرَةِ إِنۡ هَـٰذَاۤ إِلَّا ٱخۡتِلَـٰقٌ

    समिअना बेहाज़ा फ़े अल-मिल्लती अल-आख़िरति इल्ला इख्तिलाकुन

    हम लोगों ने तो ये बात पिछले दीन में कभी सुनी भी नहीं हो न हो ये उसकी मन गढ़ंत है

  8. 8 أَءُنزِلَ عَلَیۡهِ ٱلذِّكۡرُ مِنۢ بَیۡنِنَاۚ بَلۡ هُمۡ فِی شَكࣲّ مِّن ذِكۡرِیۚ بَل لَّمَّا یَذُوقُوا۟ عَذَابِ

    अउंज़िल अलय्हि अज़-ज़िक्र हुम फ़े शक्क मिन ज़िक्रि बल लम्मा यज़ूक़ू अज़ाब

    क्या हम सब लोगों में बस (मोहम्मद ही क़ाबिल था कि) उस पर कुरान नाज़िल हुआ, नहीं बात ये है कि इनके (सिरे से) मेरे कलाम ही में शक है कि मेरा है या नहीं बल्कि असल ये है कि इन लोगों ने अभी तक अज़ाब के मज़े नहीं चखे

  9. 9 أَمۡ عِندَهُمۡ خَزَاۤىِٕنُ رَحۡمَةِ رَبِّكَ ٱلۡعَزِیزِ ٱلۡوَهَّابِ

    अम इंदहुम ख़ज़ाइनु रहमत रब्बिक अल-अज़ीज़ अल-वह्हाब

    (इस वजह से ये शरारत है) (ऐ रसूल) तुम्हारे ज़बरदस्त फ़य्याज़ परवरदिगार के रहमत के ख़ज़ाने इनके पास हैं

  10. 10 أَمۡ لَهُم مُّلۡكُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَیۡنَهُمَاۖ فَلۡیَرۡتَقُوا۟ فِی ٱلۡأَسۡبَـٰبِ

    अम मुल्क अस-समावा विश्वास ते वल अर्दि वमा फ़ल्यर्तकू फ़े अल-अस्बाबी

    या सारे आसमान व ज़मीन और उन दोनों के दरमियान की सलतनत इन्हीं की ख़ास है तब इनको चाहिए कि रास्ते या सीढियाँ लगाकर (आसमान पर) चढ़ जाएँ और इन्तेज़ाम करें

  11. 11 جُندࣱ مَّا هُنَالِكَ مَهۡزُومࣱ مِّنَ ٱلۡأَحۡزَابِ

    जुन्द मा हुनालिक मह़्ज़ूम मिन अल-अहज़ाब

    (ऐ रसूल उन पैग़म्बरों के साथ झगड़ने वाले) गिरोहों में से यहाँ तुम्हारे मुक़ाबले में भी एक लशकर है जो शिकस्त खाएगा

  12. 12 كَذَّبَتۡ قَبۡلَهُمۡ قَوۡمُ نُوحࣲ وَعَادࣱ وَفِرۡعَوۡنُ ذُو ٱلۡأَوۡتَادِ

    कज़़्ज़़बत क़बलहुम क़ौम वअद फ़िरऔन ज़ु अल औताद

    उनसे पहले नूह की क़ौम और आद और फिरऔन मेंख़ों वाला

  13. 13 وَثَمُودُ وَقَوۡمُ لُوطࣲ وَأَصۡحَـٰبُ لۡـَٔیۡكَةِۚ أُو۟لَـٰۤىِٕكَ ٱلۡأَحۡزَابُ

    सामूद वकौम वा अशाब लाइका उलाइक अल-अहज़ाब

    और समूद और लूत की क़ौम और जंगल के रहने वाले (क़ौम शुऐब ये सब पैग़म्बरों को) झुठला चुकी हैं यही वह गिरोह है

  14. 14 إِن كُلٌّ إِلَّا كَذَّبَ ٱلرُّسُلَ فَحَقَّ عِقَابِ

    इन कुल्लुन इल्ला कज़्ज़ब अल-रुसुल फहक इक़ाब

    (जो शिकस्त खा चुके) सब ही ने तो पैग़म्बरों को झुठलाया तो हमारा अज़ाब ठीक आ नाज़िल हुआ

  15. 15 وَمَا یَنظُرُ هَـٰۤؤُلَاۤءِ إِلَّا صَیۡحَةࣰ وَ ٰ⁠حِدَةࣰ مَّا لَهَا مِن فَوَاقࣲ

    वमा यान्ज़ुरु हाउलाए इल्ला सैहा और विश्वास मा लहा मिन फवाक़

    और ये (काफिर) लोग बस एक चिंघाड़ (सूर के मुन्तज़िर हैं जो फिर उन्हें) चश्में ज़दन की मोहलत न देगी

  16. 16 وَقَالُوا۟ رَبَّنَا عَجِّل لَّنَا قِطَّنَا قَبۡلَ یَوۡمِ ٱلۡحِسَابِ

    व क़ालू अज्जिल लाना किताना क़िबला यौम अल-हिसाबि

    और ये लोग (मज़ाक से) कहते हैं कि परवरदिगार हिसाब के दिन (क़यामत के) क़ब्ल ही (जो) हमारी क़िस्मत को लिखा (हो) हमें जल्दी दे दे

  17. 17 ٱصۡبِرۡ عَلَىٰ مَا یَقُولُونَ وَٱذۡكُرۡ عَبۡدَنَا دَاوُۥدَ ذَا ٱلۡأَیۡدِۖ إِنَّهُۥۤ أَوَّابٌ

    अस्बिर अला याक़ुलून वज़कुर अब्दना दाऊद ज़ा अल-अय्दि औवाबुन

    (ऐ रसूल) जैसी जैसी बातें ये लोग करते हैं उन पर सब्र करो और हमारे बन्दे दाऊद को याद करो जो बड़े कूवत वाले थे

  18. 18 إِنَّا سَخَّرۡنَا ٱلۡجِبَالَ مَعَهُۥ یُسَبِّحۡنَ بِٱلۡعَشِیِّ وَٱلۡإِشۡرَاقِ

    सख़र्ना अल-जि-बा-ला युसब्बिह्न बिल्अशि वल-इश-राक

    बेशक वह हमारी बारगाह में बड़े रूजू करने वाले थे हमने पहाड़ों को भी ताबेदार बना दिया था कि उनके साथ सुबह और शाम (खुदा की) तस्बीह करते थे

  19. 19 وَٱلطَّیۡرَ مَحۡشُورَةࣰۖ كُلࣱّ لَّهُۥۤ أَوَّابࣱ

    वलतैरा माहशूराह कुल्ल अव्वाब

    और परिन्दे भी (यादे खुदा के वक्त सिमट) आते और उनके फरमाबरदार थे

  20. 20 وَشَدَدۡنَا مُلۡكَهُۥ وَءَاتَیۡنَـٰهُ ٱلۡحِكۡمَةَ وَفَصۡلَ ٱلۡخِطَابِ

    मुल्कुहु वा आतैनाहु अल-हिक्मह वफ़सला अल-खिताब

    और हमने उनकी सल्तनत को मज़बूत कर दिया और हमने उनको हिकमत और बहस के फैसले की कूवत अता फरमायी थी

  21. 21 ۞ وَهَلۡ أَتَىٰكَ نَبَؤُا۟ ٱلۡخَصۡمِ إِذۡ تَسَوَّرُوا۟ ٱلۡمِحۡرَابَ

    वहल अतियाका नबाउ अल-ख़समि इज़् तसव्वुरु अल-मिहराब

    (ऐ रसूल) क्या तुम तक उन दावेदारों की भी ख़बर पहुँची है कि जब वह हुजरे (इबादत) की दीवार फाँद पडे

  22. 22 إِذۡ دَخَلُوا۟ عَلَىٰ دَاوُۥدَ فَفَزِعَ مِنۡهُمۡۖ قَالُوا۟ لَا تَخَفۡۖ خَصۡمَانِ بَغَىٰ بَعۡضُنَا عَلَىٰ بَعۡضࣲ فَٱحۡكُم بَیۡنَنَا بِٱلۡحَقِّ وَلَا تُشۡطِطۡ وَٱهۡدِنَاۤ إِلَىٰ سَوَاۤءِ ٱلصِّرَ ٰ⁠طِ

    इज़् दख़लू अला दाऊद फ़फ़ज़िआ तख़फ़ ख़समानी बगा बसना अला बस फ़हकुम ब्येनना बिल-हक्की तोश्तित वह्दिना इला सवा अस-सिरा विश्वास ते

    (और) जब दाऊद के पास आ खड़े हुए तो वह उनसे डर गए उन लोगों ने कहा कि आप डरें नहीं (हम दोनों) एक मुक़द्दमें के फ़रीकैन हैं कि हम में से एक ने दूसरे पर ज्यादती की है तो आप हमारे दरमियान ठीक-ठीक फैसला कर दीजिए और इन्साफ से ने गुज़रिये और हमें सीधी राह दिखा दीजिए

  23. 23 إِنَّ هَـٰذَاۤ أَخِی لَهُۥ تِسۡعࣱ وَتِسۡعُونَ نَعۡجَةࣰ وَلِیَ نَعۡجَةࣱ وَ ٰ⁠حِدَةࣱ فَقَالَ أَكۡفِلۡنِیهَا وَعَزَّنِی فِی ٱلۡخِطَابِ

    इन्ना अख़ी तेस वतेस्नाईन नजा वलिया और विश्वास हेदा फ़काला अक्फिल्निहा वा अज़्ज़नी फ़े अल-खिताब

    (मुराद ये हैं कि) ये (शख्स) मेरा भाई है और उसके पास निनान्नवे दुम्बियाँ हैं और मेरे पास सिर्फ एक दुम्बी है उस पर भी ये मुझसे कहता है कि ये दुम्बी भी मुझी को दे दें और बातचीत में मुझ पर सख्ती करता है

  24. 24 قَالَ لَقَدۡ ظَلَمَكَ بِسُؤَالِ نَعۡجَتِكَ إِلَىٰ نِعَاجِهِۦۖ وَإِنَّ كَثِیرࣰا مِّنَ ٱلۡخُلَطَاۤءِ لَیَبۡغِی بَعۡضُهُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٍ إِلَّا ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَقَلِیلࣱ مَّا هُمۡۗ وَظَنَّ دَاوُۥدُ أَنَّمَا فَتَنَّـٰهُ فَٱسۡتَغۡفَرَ رَبَّهُۥ وَخَرَّ رَاكِعࣰا وَأَنَابَ ۩

    क़ाला लकद ज़लमक बेसुआली नअज्तिक इला निआज़ेहि वा इन्ना मिन अल-खुलासा लैबग़ी बअसुम अला बस इल्ला अल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति वकील मा वज़न्ना दाऊद अन्नमा फ़तन्नाहु फ़स्तग़फ़रा रब्बाहु वख़र्र राकिआन वा अनाब

    दाऊद ने (बग़ैर इसके कि मुदा आलैह से कुछ पूछें) कह दिया कि ये जो तेरी दुम्बी माँग कर अपनी दुम्बियों में मिलाना चाहता है तो ये तुझ पर ज़ुल्म करता है और अक्सर शुरका (की) यकीनन (ये हालत है कि) एक दूसरे पर जुल्म किया करते हैं मगर जिन लोगों ने (सच्चे दिल से) ईमान कुबूल किया और अच्छे (अच्छे) काम किए (वह ऐसा नहीं करते) और ऐसे लोग बहुत ही कम हैं (ये सुनकर दोनों चल दिए) और अब दाऊद ने समझा कि हमने उनका इमितेहान लिया (और वह ना कामयाब रहे) फिर तो अपने परवरदिगार से बख्शिश की दुआ माँगने लगे और सजदे में गिर पड़े और (मेरी) तरफ रूजू की (24) (सजदा)

  25. 25 فَغَفَرۡنَا لَهُۥ ذَ ٰ⁠لِكَۖ وَإِنَّ لَهُۥ عِندَنَا لَزُلۡفَىٰ وَحُسۡنَ مَـَٔابࣲ

    फ़ा-ग़ा-फ़र-ना ज़ा विश्वास वा इन्ना इंदना लज़ुल्फा वहसुना माअब

    तो हमने उनकी वह ग़लती माफ कर दी और इसमें शक नहीं कि हमारी बारगाह में उनका तक़र्रुब और अन्जाम अच्छा हुआ

  26. 26 یَـٰدَاوُۥدُ إِنَّا جَعَلۡنَـٰكَ خَلِیفَةࣰ فِی ٱلۡأَرۡضِ فَٱحۡكُم بَیۡنَ ٱلنَّاسِ بِٱلۡحَقِّ وَلَا تَتَّبِعِ ٱلۡهَوَىٰ فَیُضِلَّكَ عَن سَبِیلِ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱلَّذِینَ یَضِلُّونَ عَن سَبِیلِ ٱللَّهِ لَهُمۡ عَذَابࣱ شَدِیدُۢ بِمَا نَسُوا۟ یَوۡمَ ٱلۡحِسَابِ

    या दाऊद जाअलनाक ख़लीफ़ा फ़े अल-अर्द फ़हकुम बयना अन्नास बिल-हक्की तत्बिअ अल-हवा फ़ैज़िल्लक अन सबील इन्ना अल्लाज़ीना याज़िल्लून अन सबील अल्लाह लाहुम अज़ाब बिमा नसुआ यौम अल-हिसाबि

    (हमने फरमाया) ऐ दाऊद हमने तुमको ज़मीन में (अपना) नाएब क़रार दिया तो तुम लोगों के दरमियान बिल्कुल ठीक फैसला किया करो और नफ़सियानी ख्वाहिश की पैरवी न करो बसा ये पीरों तुम्हें ख़ुदा की राह से बहका देगी इसमें शक नहीं कि जो लोग खुदा की राह में भटकते हैं उनकी बड़ी सख्त सज़ा होगी क्योंकि उन लोगों ने हिसाब के दिन (क़यामत) को भुला दिया

  27. 27 وَمَا خَلَقۡنَا ٱلسَّمَاۤءَ وَٱلۡأَرۡضَ وَمَا بَیۡنَهُمَا بَـٰطِلࣰاۚ ذَ ٰ⁠لِكَ ظَنُّ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ۚ فَوَیۡلࣱ لِّلَّذِینَ كَفَرُوا۟ مِنَ ٱلنَّارِ

    वमा ख़लक़ना अस-समाअ वल अर्द वमा बय्नहुमा बातिल ज़ा विश्वास लेका ज़न्नु अल्लाज़ीना फवैल लिल्लाज़ीन कफ़रू मिन अन-नार

    और हमने आसमान और ज़मीन और जो चीज़ें उन दोनों के दरमियान हैं बेकार नहीं पैदा किया ये उन लोगों का ख्याल है जो काफ़िर हो बैठे तो जो लोग दोज़ख़ के मुनकिर हैं उन पर अफ़सोस है

  28. 28 أَمۡ نَجۡعَلُ ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ كَٱلۡمُفۡسِدِینَ فِی ٱلۡأَرۡضِ أَمۡ نَجۡعَلُ ٱلۡمُتَّقِینَ كَٱلۡفُجَّارِ

    अम नजअलु अल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति काल्मुफ़्सिदीन फ़े अल-अर्द अम नजअलु अल-मुत्तक़ीन कालफुज्जार

    क्या जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे-अच्छे काम किए उनको हम (उन लोगों के बराबर) कर दें जो रूए ज़मीन में फसाद फैलाया करते हैं या हम परहेज़गारों को मिसल बदकारों के बना दें

  29. 29 كِتَـٰبٌ أَنزَلۡنَـٰهُ إِلَیۡكَ مُبَـٰرَكࣱ لِّیَدَّبَّرُوۤا۟ ءَایَـٰتِهِۦ وَلِیَتَذَكَّرَ أُو۟لُوا۟ ٱلۡأَلۡبَـٰبِ

    किताबुन अंज़लनाहु इलैक मुबारक लियद्दब्बरुआ आयातिहि वलिय तज़क्कर उलू अल-बा-बि

    (ऐ रसूल) किताब (कुरान) जो हमने तुम्हारे पास नाज़िल की है (बड़ी) बरकत वाली है ताकि लोग इसकी आयतों में ग़ौर करें और ताकि अक्ल वाले नसीहत हासिल करें

  30. 30 وَوَهَبۡنَا لِدَاوُۥدَ سُلَیۡمَـٰنَۚ نِعۡمَ ٱلۡعَبۡدُ إِنَّهُۥۤ أَوَّابٌ

    वेवहब्ना लेदाउद सुलेमान निम अल-अब्दु औवाबुन

    और हमने दाऊद को सुलेमान (सा बेटा) अता किया (सुलेमान भी) क्या अच्छे बन्दे थे

  31. 31 إِذۡ عُرِضَ عَلَیۡهِ بِٱلۡعَشِیِّ ٱلصَّـٰفِنَـٰتُ ٱلۡجِیَادُ

    इज़् उरिदा अलय्हि बिल्अशि अस-साफ़िनात अल जियाद

    बेशक वह हमारी तरफ रूजू करने वाले थे इत्तोफाक़न एक दफ़ा तीसरे पहर को ख़ासे के असील घोड़े उनके सामने पेश किए गए

  32. 32 فَقَالَ إِنِّیۤ أَحۡبَبۡتُ حُبَّ ٱلۡخَیۡرِ عَن ذِكۡرِ رَبِّی حَتَّىٰ تَوَارَتۡ بِٱلۡحِجَابِ

    फ़काला अहबबतु हुब्ब अल-खैरी अन ज़िक्रि हत्ता तवारत बिल हिजाब

    तो देखने में उलझे के नवाफिल में देर हो गयी जब याद आया तो बोले कि मैंने अपने परवरदिगार की याद पर माल की उलफ़त को तरजीह दी यहाँ तक कि आफ़ताब (मग़रिब के) पर्दे में छुप गया

  33. 33 رُدُّوهَا عَلَیَّۖ فَطَفِقَ مَسۡحَۢا بِٱلسُّوقِ وَٱلۡأَعۡنَاقِ

    रुद्दुहा फ़ातफ़िका मस्हा बेल्सूक वल आनाक

    (तो बोले अच्छा) इन घोड़ों को मेरे पास वापस लाओ (जब आए) तो (देर के कफ्फ़ारा में) घोड़ों की टाँगों और गर्दनों पर हाथ फेर (काट) ने लगे

  34. 34 وَلَقَدۡ فَتَنَّا سُلَیۡمَـٰنَ وَأَلۡقَیۡنَا عَلَىٰ كُرۡسِیِّهِۦ جَسَدࣰا ثُمَّ أَنَابَ

    व-लक्द फ़तन्ना वा अल्कैना अला कुर्सिय्यिही जसदन सुम्म अनाब

    और हमने सुलेमान का इम्तेहान लिया और उनके तख्त पर एक बेजान धड़ लाकर गिरा दिया

  35. 35 قَالَ رَبِّ ٱغۡفِرۡ لِی وَهَبۡ لِی مُلۡكࣰا لَّا یَنۢبَغِی لِأَحَدࣲ مِّنۢ بَعۡدِیۤۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلۡوَهَّابُ

    क़ाला रब्बी इग़फ़िर लेइ वहब लेइ मुल्कन ला यानबगी लेअहद इन्नका अन्त अल-वह्हाब

    फिर (सुलेमान ने मेरी तरफ) रूजू की (और) कहा परवरदिगार मुझे बख्श दे और मुझे वह मुल्क अता फरमा जो मेरे बाद किसी के वास्ते शायाँह न हो इसमें तो शक नहीं कि तू बड़ा बख्शने वाला है

  36. 36 فَسَخَّرۡنَا لَهُ ٱلرِّیحَ تَجۡرِی بِأَمۡرِهِۦ رُخَاۤءً حَیۡثُ أَصَابَ

    फ़सख़्ख़र्ना लहु अर-रीह तजरी बेआम्रिही रुखाआँ हैथु असाब

    तो हमने हवा को उनका ताबेए कर दिया कि जहाँ वह पहुँचना चाहते थे उनके हुक्म के मुताबिक़ धीमी चाल चलती थी

  37. 37 وَٱلشَّیَـٰطِینَ كُلَّ بَنَّاۤءࣲ وَغَوَّاصࣲ

    वश-शयातीन कुल्ला बन्ना वगवास

    और (इसी तरह) जितने शयातीन (देव) इमारत बनाने वाले और ग़ोता लगाने वाले थे

  38. 38 وَءَاخَرِینَ مُقَرَّنِینَ فِی ٱلۡأَصۡفَادِ

    वा आख़िरीन मुकर्रिनीना फ़े अल-अस्फादि

    सबको (ताबेए कर दिया और इसके अलावा) दूसरे देवों को भी जो ज़ंज़ीरों में जकड़े हुए थे

  39. 39 هَـٰذَا عَطَاۤؤُنَا فَٱمۡنُنۡ أَوۡ أَمۡسِكۡ بِغَیۡرِ حِسَابࣲ

    हाज़ा अताउना फ़ाम्नुन औ अम्सिक बेग़ैर हिसाब

    ऐ सुलेमान ये हमारी बेहिसाब अता है पस (उसे लोगों को देकर) एहसान करो या (सब) अपने ही पास रखो

  40. 40 وَإِنَّ لَهُۥ عِندَنَا لَزُلۡفَىٰ وَحُسۡنَ مَـَٔابࣲ

    वा इन्ना इंदना लज़ुल्फा वहसुना माअब

    और इसमें शक नहीं कि सुलेमान की हमारी बारगाह में कुर्ब व मज़ेलत और उमदा जगह है

  41. 41 وَٱذۡكُرۡ عَبۡدَنَاۤ أَیُّوبَ إِذۡ نَادَىٰ رَبَّهُۥۤ أَنِّی مَسَّنِیَ ٱلشَّیۡطَـٰنُ بِنُصۡبࣲ وَعَذَابٍ

    वज़कुर अय्यूब इज़् नादिया अन्नी मस्नी अश-शैतान बेनुस्ब वा अज़ाबिन

    और (ऐ रसूल) हमारे (ख़ास) बन्दे अय्यूब को याद करो जब उन्होंने अपने परवरगिार से फरियाद की कि मुझको शैतान ने बहुत अज़ीयत और तकलीफ पहुँचा रखी है

  42. 42 ٱرۡكُضۡ بِرِجۡلِكَۖ هَـٰذَا مُغۡتَسَلُۢ بَارِدࣱ وَشَرَابࣱ

    अरकुज़ बिरेज्लिक हाज़ा मुग़्तसलुन वशराब

    तो हमने कहा कि अपने पाँव से (ज़मीन को) ठुकरा दो और चश्मा निकाला तो हमने कहा (ऐ अय्यूब) तुम्हारे नहाने और पीने के वास्ते ये ठन्डा पानी (हाज़िर) है

  43. 43 وَوَهَبۡنَا لَهُۥۤ أَهۡلَهُۥ وَمِثۡلَهُم مَّعَهُمۡ رَحۡمَةࣰ مِّنَّا وَذِكۡرَىٰ لِأُو۟لِی ٱلۡأَلۡبَـٰبِ

    वेवहब्ना अह्लुहु वमेस्लाहुम माअहुम रहमतन मिन्ना वज़िक्रा लेउली अल-बा-बि

    और हमने उनको और उनके लड़के वाले और उनके साथ उतने ही और अपनी ख़ास मेहरबानी से अता किए

  44. 44 وَخُذۡ بِیَدِكَ ضِغۡثࣰا فَٱضۡرِب بِّهِۦ وَلَا تَحۡنَثۡۗ إِنَّا وَجَدۡنَـٰهُ صَابِرࣰاۚ نِّعۡمَ ٱلۡعَبۡدُ إِنَّهُۥۤ أَوَّابࣱ

    वखुज़ बियादक ज़िग़्स फ़ाज़्रिब बिहि तहनस वजदनाहु साबिरान निमा अल-अब्दु अव्वाब

    और अक्लमंदों के लिए इबरत व नसीहत (क़रार दी) और हमने कहा ऐ अय्यूब तुम अपने हाथ से सींको का मट्ठा लो (और उससे अपनी बीवी को) मारो अपनी क़सम में झूठे न बनो हमने कहा अय्यूब को यक़ीनन साबिर पाया वह क्या अच्छे बन्दे थे

  45. 45 وَٱذۡكُرۡ عِبَـٰدَنَاۤ إِبۡرَ ٰ⁠هِیمَ وَإِسۡحَـٰقَ وَیَعۡقُوبَ أُو۟لِی ٱلۡأَیۡدِی وَٱلۡأَبۡصَـٰرِ

    वज़कुर इबादना इबरा विश्वास हेइम इसहाक व याक़ूब उली अल-अय्दी वल अब्सारी

    बेशक वह हमारी बारगाह में बड़े झुकने वाले थे और (ऐ रसूल) हमारे बन्दों में इब्राहीम और इसहाक़ और बेशक वह (हमारी बारगाह में) बड़े झुकने वाले थे और (ऐ रसूल) हमारे बन्दों में इबराहीम और इसहाक़ और याकूब को याद करो जो कुवत और बसीरत वाले थे

  46. 46 إِنَّاۤ أَخۡلَصۡنَـٰهُم بِخَالِصَةࣲ ذِكۡرَى ٱلدَّارِ

    इन्ना अख़्लसनाहुम बेखालेसे ज़िक्रिया अद-दारि

    हमने उन लोगों को एक ख़ास सिफत आख़ेरत की याद से मुमताज़ किया था

  47. 47 وَإِنَّهُمۡ عِندَنَا لَمِنَ ٱلۡمُصۡطَفَیۡنَ ٱلۡأَخۡیَارِ

    वा इन्नाहुम इंदना लामेनो अल मुस्तफायना अल-अख़्यारि

    और इसमें शक नहीं कि ये लोग हमारी बारगाह में बरगुज़ीदा और नेक लोगों में हैं

  48. 48 وَٱذۡكُرۡ إِسۡمَـٰعِیلَ وَٱلۡیَسَعَ وَذَا ٱلۡكِفۡلِۖ وَكُلࣱّ مِّنَ ٱلۡأَخۡیَارِ

    वज़कुर इसमाईल यासा वज़ा अल-किफ्लि व कुल्लुन मिन अल-अख़्यारि

    और (ऐ रसूल) इस्माईल और अलयसा और जुलकिफ़ल को (भी) याद करो और (ये) सब नेक बन्दों में हैं

  49. 49 هَـٰذَا ذِكۡرࣱۚ وَإِنَّ لِلۡمُتَّقِینَ لَحُسۡنَ مَـَٔابࣲ

    हाज़ा वा इन्ना लिल मुत्तक़ीन लहुस्ना माअब

    ये एक नसीहत है और इसमें शक नहीं कि परहेज़गारों के लिए (आख़ेरत में) यक़ीनी अच्छी आरामगाह है

  50. 50 جَنَّـٰتِ عَدۡنࣲ مُّفَتَّحَةࣰ لَّهُمُ ٱلۡأَبۡوَ ٰ⁠بُ

    जन्नत अदन मुफत्तहतन ल्लाहुम अल-अबवा विश्वास बु

    (यानि) हमेशा रहने के (बेहिश्त के) सदाबहार बाग़ात जिनके दरवाज़े उनके लिए (बराबर) खुले होगें

  51. 51 مُتَّكِـِٔینَ فِیهَا یَدۡعُونَ فِیهَا بِفَـٰكِهَةࣲ كَثِیرَةࣲ وَشَرَابࣲ

    मुत्तकीना फ़िहा यदऊन फ़िहा बेफक़ेथा कसीरा

    और ये लोग वहाँ तकिये लगाए हुए (चैन से बैठे) होगें वहाँ (खुद्दामे बेहिश्त से) कसरत से मेवे और शराब मँगवाएँगे

  52. 52 ۞ وَعِندَهُمۡ قَـٰصِرَ ٰ⁠تُ ٱلطَّرۡفِ أَتۡرَابٌ

    वा इंदहुम क़ासिर विश्वास त अल-तर्फ़ि अतराबुन

    और उनके पहलू में नीची नज़रों वाली (शरमीली) कमसिन बीवियाँ होगी

  53. 53 هَـٰذَا مَا تُوعَدُونَ لِیَوۡمِ ٱلۡحِسَابِ

    हाज़ा तुआदूनों लेयोमि अल-हिसाबि

    (मोमिनों) ये वह चीज़ हैं जिनका हिसाब के दिन (क़यामत) के लिए तुमसे वायदा किया जाता है

  54. 54 إِنَّ هَـٰذَا لَرِزۡقُنَا مَا لَهُۥ مِن نَّفَادٍ

    इन्ना हाज़ा लरेज़कुना मिन नफ़ादिन

    बेशक ये हमारी (दी हुई) रोज़ी है जो कभी तमाम न होगी

  55. 55 هَـٰذَاۚ وَإِنَّ لِلطَّـٰغِینَ لَشَرَّ مَـَٔابࣲ

    वा इन्ना लिल-ता-ग़ीन लशर माअब

    ये परहेज़गारों का (अन्जाम) है और सरकशों का तो यक़ीनी बुरा ठिकाना है

  56. 56 جَهَنَّمَ یَصۡلَوۡنَهَا فَبِئۡسَ ٱلۡمِهَادُ

    जहन्नम यस्लौनहा फ़बिस अल-मिहादु

    जहन्नुम जिसमें उनको जाना पड़ेगा तो वह क्या बुरा ठिकाना है

  57. 57 هَـٰذَا فَلۡیَذُوقُوهُ حَمِیمࣱ وَغَسَّاقࣱ

    हाज़ा फ़लियज़ूहू हमीम वगस्साक़

    ये खौलता हुआ पानी और पीप और इस तरह अनवा अक़साम की दूसरी चीज़े हैं

  58. 58 وَءَاخَرُ مِن شَكۡلِهِۦۤ أَزۡوَ ٰ⁠جٌ

    वआख़र मिन शक्लिहि अज़्वा विश्वास जून

    तो ये लोग उन्हीं पड़े चखा करें (कुछ लोगों के बारे में) बड़ों से कहा जाएगा

  59. 59 هَـٰذَا فَوۡجࣱ مُّقۡتَحِمࣱ مَّعَكُمۡ لَا مَرۡحَبَۢا بِهِمۡۚ إِنَّهُمۡ صَالُوا۟ ٱلنَّارِ

    हाज़ा फौज मुक्तहिम मरहबा इन्नाहुम सालू अन-नार

    ये (तुम्हारी चेलों की) फौज भी तुम्हारे साथ ही ढूँसी जाएगी उनका भला न हो ये सब भी दोज़ख़ को जाने वाले हैं

  60. 60 قَالُوا۟ بَلۡ أَنتُمۡ لَا مَرۡحَبَۢا بِكُمۡۖ أَنتُمۡ قَدَّمۡتُمُوهُ لَنَاۖ فَبِئۡسَ ٱلۡقَرَارُ

    अंतुम मरहबा अंतुम क़द्दमतुमूहु फ़बिस अल-क़रारु

    तो चेले कहेंगें (हम क्यों) बल्कि तुम (जहन्नुमी हो) तुम्हारा ही भला न हो तो तुम ही लोगों ने तो इस (बला) से हमारा सामना करा दिया तो जहन्नुम भी क्या बुरी जगह है

  61. 61 قَالُوا۟ رَبَّنَا مَن قَدَّمَ لَنَا هَـٰذَا فَزِدۡهُ عَذَابࣰا ضِعۡفࣰا فِی ٱلنَّارِ

    मैन क़द्दाम लना हाज़ा फ़ज़्दुह अज़ाबाँ ज़िफ़न फ़े अन-नार

    (फिर वह) अर्ज़ करेगें परवरदिगार जिस शख्स ने हमारा इस (बला) से सामना करा दिया तो तू उस पर हमसे बढ़कर जहन्नुम में दो गुना अज़ाब कर

  62. 62 وَقَالُوا۟ مَا لَنَا لَا نَرَىٰ رِجَالࣰا كُنَّا نَعُدُّهُم مِّنَ ٱلۡأَشۡرَارِ

    व क़ालू लना नारा रेजालान कुन्ना नाउद्दुहुम मिन अल-अशरारी

    और (फिर) खुद भी कहेगें हमें क्या हो गया है कि हम जिन लोगों को (दुनिया में) शरीर शुमार करते थे हम उनको यहाँ (दोज़ख़) में नहीं देखते

  63. 63 أَتَّخَذۡنَـٰهُمۡ سِخۡرِیًّا أَمۡ زَاغَتۡ عَنۡهُمُ ٱلۡأَبۡصَـٰرُ

    अत्ताख़ज़्नाहुम सेख़्रिय्या अम ज़ागत अन्हुमु अल-अब्सारु

    क्या हम उनसे (नाहक़) मसखरापन करते थे या उनकी तरफ से (हमारी) ऑंखे पलट गयी हैं

  64. 64 إِنَّ ذَ ٰ⁠لِكَ لَحَقࣱّ تَخَاصُمُ أَهۡلِ ٱلنَّارِ

    इन्ना ज़ा विश्वास लेका लहक़् तखासुम अह्ल अन-नार

    इसमें शक नहीं कि जहन्नुमियों का बाहम झगड़ना ये बिल्कुल यक़ीनी ठीक है

  65. 65 قُلۡ إِنَّمَاۤ أَنَا۠ مُنذِرࣱۖ وَمَا مِنۡ إِلَـٰهٍ إِلَّا ٱللَّهُ ٱلۡوَ ٰ⁠حِدُ ٱلۡقَهَّارُ

    क़ुल इन्नामा अना मुन्ज़िर वमा इलाह इल्ला अल्लाह अल-वा विश्वास हेदु अल-क़ह्हारु

    (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तो बस (अज़ाबे खुदा से) डराने वाला हूँ और यकता क़हार खुदा के सिवा कोई माबूद क़ाबिले परसतिश नहीं

  66. 66 رَبُّ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَیۡنَهُمَا ٱلۡعَزِیزُ ٱلۡغَفَّـٰرُ

    रब्बु अस-समावा विश्वास ते वल अर्दि वमा बय्नहुमा अल-अज़ीज़ अल-ग़फ्फारु

    सारे आसमान और ज़मीन का और जो चीज़े उन दोनों के दरमियान हैं (सबका) परवरदिगार ग़ालिब बड़ा बख्शने वाला है

  67. 67 قُلۡ هُوَ نَبَؤٌا۟ عَظِیمٌ

    क़ुल हुव नबाउआ अज़ीम

    (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ये (क़यामत) एक बहुत बड़ा वाक़िया है

  68. 68 أَنتُمۡ عَنۡهُ مُعۡرِضُونَ

    अंतुम अन्हु मुआरिदून

    जिससे तुम लोग (ख्वाहमाख्वाह) मुँह फेरते हो

  69. 69 مَا كَانَ لِیَ مِنۡ عِلۡمِۭ بِٱلۡمَلَإِ ٱلۡأَعۡلَىٰۤ إِذۡ یَخۡتَصِمُونَ

    काना लेया बिल मलाई इज़् यख्तसीमून

    आलम बाला के रहने वाले (फरिश्ते) जब वाहम बहस करते थे उसकी मुझे भी ख़बर न थी

  70. 70 إِن یُوحَىٰۤ إِلَیَّ إِلَّاۤ أَنَّمَاۤ أَنَا۠ نَذِیرࣱ مُّبِینٌ

    इन इलय्य अना नज़ीर मुबीन

    मेरे पास तो बस वही की गयी है कि मैं (खुदा के अज़ाब से) साफ-साफ डराने वाला हूँ

  71. 71 إِذۡ قَالَ رَبُّكَ لِلۡمَلَـٰۤىِٕكَةِ إِنِّی خَـٰلِقُۢ بَشَرࣰا مِّن طِینࣲ

    इज़् क़ाला रब्बुक लिल्मलाइकति इन्नी बशर मिन तीन

    (वह बहस ये थी कि) जब तुम्हारे परवरदिगार ने फरिश्तों से कहा कि मैं गीली मिट्टी से एक आदमी बनाने वाला हूँ

  72. 72 فَإِذَا سَوَّیۡتُهُۥ وَنَفَخۡتُ فِیهِ مِن رُّوحِی فَقَعُوا۟ لَهُۥ سَـٰجِدِینَ

    फ़ैज़ा सव्वैतुहु वनफ़ख्तु फ़िये मिन रूही फकऊ साजिदीना

    तो जब मैं उसको दुरूस्त कर लूँ और इसमें अपनी (पैदा) की हुई रूह फूँक दो तो तुम सब के सब उसके सामने सजदे में गिर पड़ना

  73. 73 فَسَجَدَ ٱلۡمَلَـٰۤىِٕكَةُ كُلُّهُمۡ أَجۡمَعُونَ

    फसजद अल-मलाइका कुल्लुहुम अज्मेउन

    तो सब के सब कुल फरिश्तों ने सजदा किया

  74. 74 إِلَّاۤ إِبۡلِیسَ ٱسۡتَكۡبَرَ وَكَانَ مِنَ ٱلۡكَـٰفِرِینَ

    इबलीस इस्तक़बर वा काना मिन अल-काफिरीन

    मगर (एक) इबलीस ने कि वह शेख़ी में आ गया और काफिरों में हो गया

  75. 75 قَالَ یَـٰۤإِبۡلِیسُ مَا مَنَعَكَ أَن تَسۡجُدَ لِمَا خَلَقۡتُ بِیَدَیَّۖ أَسۡتَكۡبَرۡتَ أَمۡ كُنتَ مِنَ ٱلۡعَالِینَ

    क़ाला या इबलीस मनअक अन तस्जुदा लेमा ख़लक़्तु बिदाय अस्तकबरता अम कोंता मिन अल-आलीन

    ख़ुदा ने (इबलीस से) फरमाया कि ऐ इबलीस जिस चीज़ को मैंने अपनी ख़ास कुदरत से पैदा किया (भला) उसको सजदा करने से तुझे किसी ने रोका क्या तूने तक़ब्बुर किया या वाकई तू बड़े दरजे वालें में है

  76. 76 قَالَ أَنَا۠ خَیۡرࣱ مِّنۡهُ خَلَقۡتَنِی مِن نَّارࣲ وَخَلَقۡتَهُۥ مِن طِینࣲ

    क़ाला अना ख़ैर ख़ालक़तनी मिन नार वा ख़लक़्तुहु मिन तीन

    इबलीस बोल उठा कि मैं उससे बेहतर हूँ तूने मुझे आग से पैदा किया और इसको तूने गीली मिट्टी से पैदा किया

  77. 77 قَالَ فَٱخۡرُجۡ مِنۡهَا فَإِنَّكَ رَجِیمࣱ

    क़ाला फ़ख़्रुज मिन्हा फ़ाइन्नक रेजिम

    (कहाँ आग कहाँ मिट्टी) खुदा ने फरमाया कि तू यहाँ से निकल (दूर हो) तू यक़ीनी मरदूद है

  78. 78 وَإِنَّ عَلَیۡكَ لَعۡنَتِیۤ إِلَىٰ یَوۡمِ ٱلدِّینِ

    वा इन्ना अलैक लान्तिय इला यौम अद-दीन

    और तुझ पर रोज़ जज़ा (क़यामत) तक मेरी फिटकार पड़ा करेगी

  79. 79 قَالَ رَبِّ فَأَنظِرۡنِیۤ إِلَىٰ یَوۡمِ یُبۡعَثُونَ

    क़ाला रब्बी फ़ा-अंज़िर्नी इला यौम युबाथून

    शैतान ने अर्ज़ की परवरदिगार तू मुझे उस दिन तक की मोहलत अता कर जिसमें सब लोग (दोबारा) उठा खड़े किए जायेंगे

  80. 80 قَالَ فَإِنَّكَ مِنَ ٱلۡمُنظَرِینَ

    क़ाला फ़ाइन्नक मिन अल मुन्ज़रीन

    फरमाया तुझे एक वक्त मुअय्यन के दिन तक की मोहलत दी गयी

  81. 81 إِلَىٰ یَوۡمِ ٱلۡوَقۡتِ ٱلۡمَعۡلُومِ

    इला यौम अल-वक़्ति अल-मअलूमी

    वह बोला तेरी ही इज्ज़त व जलाल की क़सम

  82. 82 قَالَ فَبِعِزَّتِكَ لَأُغۡوِیَنَّهُمۡ أَجۡمَعِینَ

    क़ाला फ़बिइज़्ज़ातिक लाउग्वियन्नाहुम अजमैन

    उनमें से तेरे ख़ालिस बन्दों के सिवा सब के सब को ज़रूर गुमराह करूँगा

  83. 83 إِلَّا عِبَادَكَ مِنۡهُمُ ٱلۡمُخۡلَصِینَ

    इल्ला इबादक मिन्हुमु अल-मुख्लसीन

    खुदा ने फरमाया तो (हम भी) हक़ बात (कहे देते हैं)

  84. 84 قَالَ فَٱلۡحَقُّ وَٱلۡحَقَّ أَقُولُ

    क़ाला फ़ल्हक़्क़ु वल-हक्क अक़ूलु

    और मैं तो हक़ ही कहा करता हूँ

  85. 85 لَأَمۡلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنكَ وَمِمَّن تَبِعَكَ مِنۡهُمۡ أَجۡمَعِینَ

    लाअम्लाअन्न जहन्नम मिन्क वमम्मान तबेअका मिन्हुम अजमैन

    कि मैं तुझसे और जो लोग तेरी ताबेदारी करेंगे उन सब से जहन्नुम को ज़रूर भरूँगा

  86. 86 قُلۡ مَاۤ أَسۡـَٔلُكُمۡ عَلَیۡهِ مِنۡ أَجۡرࣲ وَمَاۤ أَنَا۠ مِنَ ٱلۡمُتَكَلِّفِینَ

    क़ुल मा असअलुकुम अलय्हि अना मिन अल-मुतकल्लिफ़ीना

    (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तो तुमसे न इस (तबलीग़े रिसालत) की मज़दूरी माँगता हूँ और न मैं (झूठ मूठ) बनावट करने वाला हूँ

  87. 87 إِنۡ هُوَ إِلَّا ذِكۡرࣱ لِّلۡعَـٰلَمِینَ

    हुव इल्ला ज़िक्र लिलआलमीन

    ये (क़ुरान) तो बस सारे जहाँन के लिए नसीहत है

  88. 88 وَلَتَعۡلَمُنَّ نَبَأَهُۥ بَعۡدَ حِینِۭ

    वेलात'लेमुन्ना नबाअहु बाद हेइन

    और कुछ दिनों बाद तुमको इसकी हक़ीकत मालूम हो जाएगी

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