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Muhammad

मुहम्मद

मुहम्मद

38 ayahsMedinanहिन्दी

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بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ

बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम

  1. 1 ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوا۟ عَن سَبِیلِ ٱللَّهِ أَضَلَّ أَعۡمَـٰلَهُمۡ

    अल्लाज़ीना कफ़रू वसद्दू अन सबील अल्लाह अदल्ल अआमालहुम

    जिन लोगों ने कुफ़्र एख्तेयार किया और (लोगों को) ख़ुदा के रास्ते से रोका ख़ुदा ने उनके आमाल अकारत कर दिए

  2. 2 وَٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَءَامَنُوا۟ بِمَا نُزِّلَ عَلَىٰ مُحَمَّدࣲ وَهُوَ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّهِمۡ كَفَّرَ عَنۡهُمۡ سَیِّـَٔاتِهِمۡ وَأَصۡلَحَ بَالَهُمۡ

    वल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति वा अमानू बिमा नुज़्ज़िल अला मुहम्मद वहुव मिन रब्बिहिम कफ़्फ़ारा अन्हुम वा अस-लह बालेहुम

    और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे (अच्छे) काम किए और जो (किताब) मोहम्मद पर उनके परवरदिगार की तरफ से नाज़िल हुई है और वह बरहक़ है उस पर ईमान लाए तो ख़ुदा ने उनके गुनाह उनसे दूर कर दिए और उनकी हालत संवार दी

  3. 3 ذَ ٰ⁠لِكَ بِأَنَّ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ ٱتَّبَعُوا۟ ٱلۡبَـٰطِلَ وَأَنَّ ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّبَعُوا۟ ٱلۡحَقَّ مِن رَّبِّهِمۡۚ كَذَ ٰ⁠لِكَ یَضۡرِبُ ٱللَّهُ لِلنَّاسِ أَمۡثَـٰلَهُمۡ

    ज़ा विश्वास लेका बेअन्ना अल्लाज़ीना कफ़रू इत्तबाउ अल-बातिल वा-अन्ना अल्लाज़ीना अमेनुआ इत्तबाउ अल-हक़् मिन कज़ा विश्वास लेका याद्रिबु अल्लाह लिल-नास अम्सालहुम

    ये इस वजह से कि काफिरों ने झूठी बात की पैरवी की और ईमान वालों ने अपने परवरदिगार का सच्चा दीन एख्तेयार किया यूँ ख़ुदा लोगों के समझाने के लिए मिसालें बयान करता है

  4. 4 فَإِذَا لَقِیتُمُ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ فَضَرۡبَ ٱلرِّقَابِ حَتَّىٰۤ إِذَاۤ أَثۡخَنتُمُوهُمۡ فَشُدُّوا۟ ٱلۡوَثَاقَ فَإِمَّا مَنَّۢا بَعۡدُ وَإِمَّا فِدَاۤءً حَتَّىٰ تَضَعَ ٱلۡحَرۡبُ أَوۡزَارَهَاۚ ذَ ٰ⁠لِكَۖ وَلَوۡ یَشَاۤءُ ٱللَّهُ لَٱنتَصَرَ مِنۡهُمۡ وَلَـٰكِن لِّیَبۡلُوَا۟ بَعۡضَكُم بِبَعۡضࣲۗ وَٱلَّذِینَ قُتِلُوا۟ فِی سَبِیلِ ٱللَّهِ فَلَن یُضِلَّ أَعۡمَـٰلَهُمۡ

    फ़ैज़ा लक़ीतुम अल्लाज़ीना कफ़रू फ़ज़रबा अर-रिकाब असखानतुमुहुम फ़ेशुद्दू अल वसाका फ़ेइम्मा मन्ना बअदु वा इम्मा फ़िदाअन हत्ता ताज़ा अल-हरबु ओज़ाराहा ज़ा विश्वास वलाउ यशा अल्लाह लाँतसर मिन्हुम वलाकिन लियब्लुआ बसकुम बिबा'स वल्लाज़ीना क़ुतिलु फ़े सबील अल्लाह फ़लान युज़िल्ल अआमालहुम

    तो जब तुम काफिरों से भिड़ो तो (उनकी) गर्दनें मारो यहाँ तक कि जब तुम उन्हें ज़ख्मों से चूर कर डालो तो उनकी मुश्कें कस लो फिर उसके बाद या तो एहसान रख (कर छोड़ दे) या मुआवेज़ा लेकर, यहाँ तक कि (दुशमन) लड़ाई के हथियार रख दे तो (याद रखो) अगर ख़ुदा चाहता तो (और तरह) उनसे बदला लेता मगर उसने चाहा कि तुम्हारी आज़माइश एक दूसरे से (लड़वा कर) करे और जो लोग ख़ुदा की राह में यहीद किये गए उनकी कारगुज़ारियों को ख़ुदा हरगिज़ अकारत न करेगा

  5. 5 سَیَهۡدِیهِمۡ وَیُصۡلِحُ بَالَهُمۡ

    सयहदिहिम वयुस्लिहु बालेहुम

    उन्हें अनक़रीब मंज़िले मक़सूद तक पहुँचाएगा

  6. 6 وَیُدۡخِلُهُمُ ٱلۡجَنَّةَ عَرَّفَهَا لَهُمۡ

    वयुधुलुहुम अल जन्नत अर्रफ़हा लाहुम

    और उनकी हालत सवार देगा और उनको उस बेहिश्त में दाख़िल करेगा जिसका उन्हें (पहले से) येनासा कर रखा है

  7. 7 یَـٰۤأَیُّهَا ٱلَّذِینَ ءَامَنُوۤا۟ إِن تَنصُرُوا۟ ٱللَّهَ یَنصُرۡكُمۡ وَیُثَبِّتۡ أَقۡدَامَكُمۡ

    या अय्युहा अल्लाज़ीना इन तंसुरुव अल्लाह यान्सुरकुम व युसब्बित अक़्दामाकुम

    ऐ ईमानदारों अगर तुम ख़ुदा (के दीन) की मदद करोगे तो वह भी तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें साबित क़दम रखेगा

  8. 8 وَٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ فَتَعۡسࣰا لَّهُمۡ وَأَضَلَّ أَعۡمَـٰلَهُمۡ

    वल्लाज़ीना कफ़रू फ़ातसन ल्लाहुम वा अदल्ल अआमालहुम

    और जो लोग काफ़िर हैं उनके लिए तो डगमगाहट है और ख़ुदा (उनके) आमाल बरबाद कर देगा

  9. 9 ذَ ٰ⁠لِكَ بِأَنَّهُمۡ كَرِهُوا۟ مَاۤ أَنزَلَ ٱللَّهُ فَأَحۡبَطَ أَعۡمَـٰلَهُمۡ

    ज़ा विश्वास लेका बे-अन-नाहुम करेहुआ मा अंज़ल अल्लाह फा अहबत अआमालहुम

    ये इसलिए कि ख़ुदा ने जो चीज़ नाज़िल फ़रमायी उसे उन्होने (नापसन्द किया) तो ख़ुदा ने उनकी कारस्तानियों को अकारत कर दिया

  10. 10 ۞ أَفَلَمۡ یَسِیرُوا۟ فِی ٱلۡأَرۡضِ فَیَنظُرُوا۟ كَیۡفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلَّذِینَ مِن قَبۡلِهِمۡۖ دَمَّرَ ٱللَّهُ عَلَیۡهِمۡۖ وَلِلۡكَـٰفِرِینَ أَمۡثَـٰلُهَا

    अफ़लम यासिरुवा फ़े अल-अर्द फ़यन्ज़ुरू कैफ़ा काना अक़ीबा अल्लाज़ीना मिन दम्मारा अल्लाह व लिल काफिरीन अमसालुहा

    तो क्या ये लोग रूए ज़मीन पर चले फिरे नहीं तो देखते जो लोग उनसे पहले थे उनका अन्जाम क्या (ख़राब) हुआ कि ख़ुदा ने उन पर तबाही डाल दी और इसी तरह (उन) काफिरों को भी (सज़ा मिलेगी)

  11. 11 ذَ ٰ⁠لِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ مَوۡلَى ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَأَنَّ ٱلۡكَـٰفِرِینَ لَا مَوۡلَىٰ لَهُمۡ

    ज़ा विश्वास लेका बेअन्ना अल्लाह मौला अल्लाज़ीना अमेनुआ वा-अन्ना अल-काफिरीन मौला लाहुम

    ये इस वजह से कि ईमानदारों का ख़ुदा सरपरस्त है और काफिरों का हरगिज़ कोई सरपरस्त नहीं

  12. 12 إِنَّ ٱللَّهَ یُدۡخِلُ ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ جَنَّـٰتࣲ تَجۡرِی مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَـٰرُۖ وَٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ یَتَمَتَّعُونَ وَیَأۡكُلُونَ كَمَا تَأۡكُلُ ٱلۡأَنۡعَـٰمُ وَٱلنَّارُ مَثۡوࣰى لَّهُمۡ

    इन्ना अल्लाह युज़्खिलु अल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति तजरी मिन तहतिहा वल्लाज़ीना कफ़रू यतमत्तौना वया कुलून ता'कुलु अल-अनआम वल्नारु मसवा ल्लाहुम

    ख़ुदा उन लोगों को जो ईमान लाए और अच्छे (अच्छे) काम करते रहे ज़रूर बेहिश्त के उन बाग़ों में जा पहुँचाएगा जिनके नीचे नहरें जारी हैं और जो काफ़िर हैं वह (दुनिया में) चैन करते हैं और इस तरह (बेफिक्री से खाते (पीते) हैं जैसे चारपाए खाते पीते हैं और आख़िर) उनका ठिकाना जहन्नुम है

  13. 13 وَكَأَیِّن مِّن قَرۡیَةٍ هِیَ أَشَدُّ قُوَّةࣰ مِّن قَرۡیَتِكَ ٱلَّتِیۤ أَخۡرَجَتۡكَ أَهۡلَكۡنَـٰهُمۡ فَلَا نَاصِرَ لَهُمۡ

    व क अय्यिन मिन क़रिया हेया अशद्दु मिन क़रियतिक अख़्रजत्क अहलकनाहुम फ़ला नासिर लाहुम

    और जिस बस्ती से तुम लोगों ने निकाल दिया उससे ज़ोर में कहीं बढ़ चढ़ के बहुत सी बस्तियाँ थीं जिनको हमने तबाह बर्बाद कर दिया तो उनका कोई मददगार भी न हुआ

  14. 14 أَفَمَن كَانَ عَلَىٰ بَیِّنَةࣲ مِّن رَّبِّهِۦ كَمَن زُیِّنَ لَهُۥ سُوۤءُ عَمَلِهِۦ وَٱتَّبَعُوۤا۟ أَهۡوَاۤءَهُم

    अफामन काना अला बय्यिना मिन रब्बिहि कमन ज़ोयना सू अमलिही

    क्या जो शख़्श अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हो उस शख़्श के बराबर हो सकता है जिसकी बदकारियाँ उसे भली कर दिखायीं गयीं हों वह अपनी नफ़सियानी ख्वाहिशों पर चलते हैं

  15. 15 مَّثَلُ ٱلۡجَنَّةِ ٱلَّتِی وُعِدَ ٱلۡمُتَّقُونَۖ فِیهَاۤ أَنۡهَـٰرࣱ مِّن مَّاۤءٍ غَیۡرِ ءَاسِنࣲ وَأَنۡهَـٰرࣱ مِّن لَّبَنࣲ لَّمۡ یَتَغَیَّرۡ طَعۡمُهُۥ وَأَنۡهَـٰرࣱ مِّنۡ خَمۡرࣲ لَّذَّةࣲ لِّلشَّـٰرِبِینَ وَأَنۡهَـٰرࣱ مِّنۡ عَسَلࣲ مُّصَفࣰّىۖ وَلَهُمۡ فِیهَا مِن كُلِّ ٱلثَّمَرَ ٰ⁠تِ وَمَغۡفِرَةࣱ مِّن رَّبِّهِمۡۖ كَمَنۡ هُوَ خَـٰلِدࣱ فِی ٱلنَّارِ وَسُقُوا۟ مَاۤءً حَمِیمࣰا فَقَطَّعَ أَمۡعَاۤءَهُمۡ

    मिसाल अल जन्नत अल-लाती वुइद अल-मुत्तक़ून अनहार मिन मा ग़ैर असिर वा नहर मिन लबन लम यतग़ैयर ताअ्मुहु वा नहर ख़म्र लिज़्ज़त लिल शारिबीन वा नहर असलिन मुसफ्फा वलहुम फ़िहा मिन कुल्लि अस-समारा विश्वास ते वमग़फ़िरा मिन हुव ख़ालिद फ़े अन-नार वसुक़ु माएन हमीम फ़कत्ता अम'आआहुम

    जिस बेहिश्त का परहेज़गारों से वायदा किया जाता है उसकी सिफत ये है कि उसमें पानी की नहरें जिनमें ज़रा बू नहीं और दूध की नहरें हैं जिनका मज़ा तक नहीं बदला और शराब की नहरें हैं जो पीने वालों के लिए (सरासर) लज्ज़त है और साफ़ शफ्फ़ाफ़ यहद की नहरें हैं और वहाँ उनके लिए हर किस्म के मेवे हैं और उनके परवरदिगार की तरफ से बख़्शिस है (भला ये लोग) उनके बराबर हो सकते हैं जो हमेशा दोज़ख़ में रहेंगे और उनको खौलता हुआ पानी पिलाया जाएगा तो वह ऑंतों के टुकड़े टुकड़े कर डालेगा

  16. 16 وَمِنۡهُم مَّن یَسۡتَمِعُ إِلَیۡكَ حَتَّىٰۤ إِذَا خَرَجُوا۟ مِنۡ عِندِكَ قَالُوا۟ لِلَّذِینَ أُوتُوا۟ ٱلۡعِلۡمَ مَاذَا قَالَ ءَانِفًاۚ أُو۟لَـٰۤىِٕكَ ٱلَّذِینَ طَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ وَٱتَّبَعُوۤا۟ أَهۡوَاۤءَهُمۡ

    वा मिन्हुम मेन यास्तमिउ इलैक इज़ा ख़रजू इंदेक लिल्लाज़िना उतुआ अल-इल्म क़ाला आनिफा उलाइक अल्लाज़ीना ताबा अल्लाह अला

    और (ऐ रसूल) उनमें से बाज़ ऐसे भी हैं जो तुम्हारी तरफ कान लगाए रहते हैं यहाँ तक कि सब सुना कर जब तुम्हारे पास से निकलते हैं तो जिन लोगों को इल्म (कुरान) दिया गया है उनसे कहते हैं (क्यों भई) अभी उस शख़्श ने क्या कहा था ये वही लोग हैं जिनके दिलों पर ख़ुदा ने (कुफ़्र की) अलामत मुक़र्रर कर दी है और ये अपनी नफसियानी ख्वाहिशों पर चल रहे हैं

  17. 17 وَٱلَّذِینَ ٱهۡتَدَوۡا۟ زَادَهُمۡ هُدࣰى وَءَاتَىٰهُمۡ تَقۡوَىٰهُمۡ

    वल्लाज़ीना इह्तेदौ ज़ादेहुम हुदन वा आताहुम तक़्वाहुम

    और जो लोग हिदायत याफ़ता हैं उनको ख़ुदा (क़ुरान के ज़रिए से) मज़ीद हिदायत करता है और उनको परहेज़गारी अता फरमाता है

  18. 18 فَهَلۡ یَنظُرُونَ إِلَّا ٱلسَّاعَةَ أَن تَأۡتِیَهُم بَغۡتَةࣰۖ فَقَدۡ جَاۤءَ أَشۡرَاطُهَاۚ فَأَنَّىٰ لَهُمۡ إِذَا جَاۤءَتۡهُمۡ ذِكۡرَىٰهُمۡ

    फहल यान्ज़ुरून इल्ला अस-साआ अन ता'तियाहुम बग़्तातन फ़कद जा अशरातुहा फा अन्ना लाहुम इज़ा जाआतहुम ज़िक्रियाहुम

    तो क्या ये लोग बस क़यामत ही के मुनतज़िर हैं कि उन पर एक बारगी आ जाए तो उसकी निशानियाँ आ चुकी हैं तो जिस वक्त क़यामत उन (के सर) पर आ पहुँचेगी फिर उन्हें नसीहत कहाँ मुफीद हो सकती है

  19. 19 فَٱعۡلَمۡ أَنَّهُۥ لَاۤ إِلَـٰهَ إِلَّا ٱللَّهُ وَٱسۡتَغۡفِرۡ لِذَنۢبِكَ وَلِلۡمُؤۡمِنِینَ وَٱلۡمُؤۡمِنَـٰتِۗ وَٱللَّهُ یَعۡلَمُ مُتَقَلَّبَكُمۡ وَمَثۡوَىٰكُمۡ

    फ़ालम ला इलाह इल्ला अल्लाह वस्तग़फ़िर लेज़़ान्बिक वलिल्मु'मिनीन वल्लाहु यालमु मुतक़ल्लबकुम वमसवा कुम

    तो फिर समझ लो कि ख़ुदा के सिवा कोई माबूद नहीं और (हम से) अपने और ईमानदार मर्दों और ईमानदार औरतों के गुनाहों की माफ़ी मांगते रहो और ख़ुदा तुम्हारे चलने फिरने और ठहरने से (ख़ूब) वाक़िफ़ है

  20. 20 وَیَقُولُ ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ لَوۡلَا نُزِّلَتۡ سُورَةࣱۖ فَإِذَاۤ أُنزِلَتۡ سُورَةࣱ مُّحۡكَمَةࣱ وَذُكِرَ فِیهَا ٱلۡقِتَالُ رَأَیۡتَ ٱلَّذِینَ فِی قُلُوبِهِم مَّرَضࣱ یَنظُرُونَ إِلَیۡكَ نَظَرَ ٱلۡمَغۡشِیِّ عَلَیۡهِ مِنَ ٱلۡمَوۡتِۖ فَأَوۡلَىٰ لَهُمۡ

    वा यक़ूलु अल्लाज़ीना अमेनुआ लौला नुज़्ज़िलत सूरा उन्ज़िलत मुहकमाह वज़ुकिरा फ़िहा अल-किताल रायता अल्लाज़ीना फ़े क़ुलूबिहिम मारद यान्ज़ुरून इलैक नज़र अल मग़्शिय्यि अलय्हि मिन फ़ाओला लाहुम

    और मोमिनीन कहते हैं कि (जेहाद के बारे में) कोई सूरा क्यों नहीं नाज़िल होता लेकिन जब कोई साफ़ सरीही मायनों का सूरा नाज़िल हुआ और उसमें जेहाद का बयान हो तो जिन लोगों के दिल में (नेफ़ाक़) का मर्ज़ है तुम उनको देखोगे कि तुम्हारी तरफ़ इस तरह देखते हैं जैसे किसी पर मौत की बेहोशी (छायी) हो (कि उसकी ऑंखें पथरा जाएं) तो उन पर वाए हो

  21. 21 طَاعَةࣱ وَقَوۡلࣱ مَّعۡرُوفࣱۚ فَإِذَا عَزَمَ ٱلۡأَمۡرُ فَلَوۡ صَدَقُوا۟ ٱللَّهَ لَكَانَ خَیۡرࣰا لَّهُمۡ

    ता'आ वक़ौलुन मारूफ़ फ़ैज़ा अज़म अल-अम्रु फ़लौ सदक़ू अल्लाह लाकान खैरन ल्लाहुम

    (उनके लिए अच्छा काम तो) फरमाबरदारी और पसन्दीदा बात है फिर जब लड़ाई ठन जाए तो अगर ये लोग ख़ुदा से सच्चे रहें तो उनके हक़ में बहुत बेहतर है

  22. 22 فَهَلۡ عَسَیۡتُمۡ إِن تَوَلَّیۡتُمۡ أَن تُفۡسِدُوا۟ فِی ٱلۡأَرۡضِ وَتُقَطِّعُوۤا۟ أَرۡحَامَكُمۡ

    फहल असैतुम इन तवल्लैतुम अन तुफ़्सीदुआ फ़े अल-अर्द वा तुकत्ताउ अरहामाकुम

    (मुनाफ़िक़ों) क्या तुमसे कुछ दूर है कि अगर तुम हाक़िम बनो तो रूए ज़मीन में फसाद फैलाने और अपने रिश्ते नातों को तोड़ने लगो ये वही लोग हैं जिन पर ख़ुदा ने लानत की है

  23. 23 أُو۟لَـٰۤىِٕكَ ٱلَّذِینَ لَعَنَهُمُ ٱللَّهُ فَأَصَمَّهُمۡ وَأَعۡمَىٰۤ أَبۡصَـٰرَهُمۡ

    उलाइक अल्लाज़ीना लअनहुमु अल्लाह फ़ा'असम्महुम वअला अब्सारहुम

    और (गोया ख़ुद उसने) उन (के कानों) को बहरा और ऑंखों को अंधा कर दिया है

  24. 24 أَفَلَا یَتَدَبَّرُونَ ٱلۡقُرۡءَانَ أَمۡ عَلَىٰ قُلُوبٍ أَقۡفَالُهَاۤ

    अ-फा-ला यतदब्बरून कुरान अम अला क़ुलूबिन अक़्फ़ालुहा

    तो क्या लोग क़ुरान में (ज़रा भी) ग़ौर नहीं करते या (उनके) दिलों पर ताले लगे हुए हैं

  25. 25 إِنَّ ٱلَّذِینَ ٱرۡتَدُّوا۟ عَلَىٰۤ أَدۡبَـٰرِهِم مِّنۢ بَعۡدِ مَا تَبَیَّنَ لَهُمُ ٱلۡهُدَى ٱلشَّیۡطَـٰنُ سَوَّلَ لَهُمۡ وَأَمۡلَىٰ لَهُمۡ

    इन्ना अल्लाज़ीना इरतेद्दु अदबारिहिम बादि तबय्यना लहुम अल्हुदा अश-शैतान सौव्वला लाहुम वा अम्लिया लाहुम

    बेशक जो लोग राहे हिदायत साफ़ साफ़ मालूम होने के बाद उलटे पाँव (कुफ़्र की तरफ) फिर गये शैतान ने उन्हें (बुते देकर) ढील दे रखी है और उनकी (तमन्नाओं) की रस्सियाँ दराज़ कर दी हैं

  26. 26 ذَ ٰ⁠لِكَ بِأَنَّهُمۡ قَالُوا۟ لِلَّذِینَ كَرِهُوا۟ مَا نَزَّلَ ٱللَّهُ سَنُطِیعُكُمۡ فِی بَعۡضِ ٱلۡأَمۡرِۖ وَٱللَّهُ یَعۡلَمُ إِسۡرَارَهُمۡ

    ज़ा विश्वास लेका बे-अन-नाहुम लिल्लाज़िना करेहुआ नज़्ज़ाल अल्लाह सानुतिउकुम फ़े बस वल्लाहु यालमु इस्रारहुम

    यह इसलिए जो लोग ख़ुदा की नाज़िल की हुई(किताब) से बेज़ार हैं ये उनसे कहते हैं कि बाज़ कामों में हम तुम्हारी ही बात मानेंगे और ख़ुदा उनके पोशीदा मशवरों से वाक़िफ है

  27. 27 فَكَیۡفَ إِذَا تَوَفَّتۡهُمُ ٱلۡمَلَـٰۤىِٕكَةُ یَضۡرِبُونَ وُجُوهَهُمۡ وَأَدۡبَـٰرَهُمۡ

    फकयफ इज़ा तवफ़्फ़त्हुमु अल-मलाइका यज़्रिबून वुजुहुम वा अदबारहुम

    तो जब फ़रिश्तें उनकी जान निकालेंगे उस वक्त उनका क्या हाल होगा कि उनके चेहरों पर और उनकी पुश्त पर मारते जाएँगे

  28. 28 ذَ ٰ⁠لِكَ بِأَنَّهُمُ ٱتَّبَعُوا۟ مَاۤ أَسۡخَطَ ٱللَّهَ وَكَرِهُوا۟ رِضۡوَ ٰ⁠نَهُۥ فَأَحۡبَطَ أَعۡمَـٰلَهُمۡ

    ज़ा विश्वास लेका बे-अन-नाहुम इत्तबाउ मा असखट अल्लाह वकरिहुआ रिज़्वा विश्वास नहो फा अहबत अआमालहुम

    ये इस सबब से कि जिस चीज़ों से ख़ुदा नाख़ुश है उसकी तो ये लोग पैरवी करते हैं और जिसमें ख़ुदा की ख़ुशी है उससे बेज़ार हैं तो ख़ुदा ने भी उनकी कारस्तानियों को अकारत कर दिया

  29. 29 أَمۡ حَسِبَ ٱلَّذِینَ فِی قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَن لَّن یُخۡرِجَ ٱللَّهُ أَضۡغَـٰنَهُمۡ

    अम हसिब अल्लाज़ीना फ़े क़ुलूबिहिम मरज़ अन लान युख़्रिज़ अल्लाह अज़्ग़ानहुम

    क्या वह लोग जिनके दिलों में (नेफ़ाक़ का) मर्ज़ है ये ख्याल करते हैं कि ख़ुदा दिल के कीनों को भी न ज़ाहिर करेगा

  30. 30 وَلَوۡ نَشَاۤءُ لَأَرَیۡنَـٰكَهُمۡ فَلَعَرَفۡتَهُم بِسِیمَـٰهُمۡۚ وَلَتَعۡرِفَنَّهُمۡ فِی لَحۡنِ ٱلۡقَوۡلِۚ وَٱللَّهُ یَعۡلَمُ أَعۡمَـٰلَكُمۡ

    वलाउ नेशा ला अरैनाकुम फ़लअरफ़तुम वलातअरिफन्नहुम फ़े लहिन वल्लाहु यालमु अआमालुकुम

    तो हम चाहते तो हम तुम्हें इन लोगों को दिखा देते तो तुम उनकी पेशानी ही से उनको पहचान लेते अगर तुम उन्हें उनके अन्दाज़े गुफ्तगू ही से ज़रूर पहचान लोगे और ख़ुदा तो तुम्हारे आमाल से वाक़िफ है

  31. 31 وَلَنَبۡلُوَنَّكُمۡ حَتَّىٰ نَعۡلَمَ ٱلۡمُجَـٰهِدِینَ مِنكُمۡ وَٱلصَّـٰبِرِینَ وَنَبۡلُوَا۟ أَخۡبَارَكُمۡ

    वा-लन-ब्लु-वन-कुम हत्ता नालम अल-मुजाहिदीन मिन्कुम वल-सा-बि-रि-न वेनाब्लुआ अख़्बारकुम

    और हम तुम लोगों को ज़रूर आज़माएँगे ताकि तुममें जो लोग जेहाद करने वाले और (तकलीफ़) झेलने वाले हैं उनको देख लें और तुम्हारे हालात जाँच लें

  32. 32 إِنَّ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوا۟ عَن سَبِیلِ ٱللَّهِ وَشَاۤقُّوا۟ ٱلرَّسُولَ مِنۢ بَعۡدِ مَا تَبَیَّنَ لَهُمُ ٱلۡهُدَىٰ لَن یَضُرُّوا۟ ٱللَّهَ شَیۡـࣰٔا وَسَیُحۡبِطُ أَعۡمَـٰلَهُمۡ

    इन्ना अल्लाज़ीना कफ़रू वसद्दू अन सबील अल्लाह वशाक़्क़ू अर-रसूल बादि तबय्यना लहुम लैन याज़ुर्रू अल्लाह वसायुह्बिटु अआमालहुम

    बेशक जिन लोगों पर (दीन की) सीधी राह साफ़ ज़ाहिर हो गयी उसके बाद इन्कार कर बैठे और (लोगों को) ख़ुदा की राह से रोका और पैग़म्बर की मुख़ालेफ़त की तो ख़ुदा का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे और वह उनका सब किया कराया अक़ारत कर देगा

  33. 33 ۞ یَـٰۤأَیُّهَا ٱلَّذِینَ ءَامَنُوۤا۟ أَطِیعُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِیعُوا۟ ٱلرَّسُولَ وَلَا تُبۡطِلُوۤا۟ أَعۡمَـٰلَكُمۡ

    या अय्युहा अल्लाज़ीना अतीउ अल्लाह वा-ती-ऊ अर-रसूल तोब्तिलुआ अआमालुकुम

    ऐ ईमानदारों ख़ुदा का हुक्म मानों और रसूल की फरमाँबरदारी करो और अपने आमाल को ज़ाया न करो

  34. 34 إِنَّ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوا۟ عَن سَبِیلِ ٱللَّهِ ثُمَّ مَاتُوا۟ وَهُمۡ كُفَّارࣱ فَلَن یَغۡفِرَ ٱللَّهُ لَهُمۡ

    इन्ना अल्लाज़ीना कफ़रू वसद्दू अन सबील अल्लाह सुम्म मातुआ वहुम कुफ्फार फ़लान यग़फ़िर अल्लाह लाहुम

    बेशक जो लोग काफ़िर हो गए और लोगों को ख़ुदा की राह से रोका, फिर काफिर ही मर गए तो ख़ुदा उनको हरगिज़ नहीं बख्शेगा तो तुम हिम्मत न हारो

  35. 35 فَلَا تَهِنُوا۟ وَتَدۡعُوۤا۟ إِلَى ٱلسَّلۡمِ وَأَنتُمُ ٱلۡأَعۡلَوۡنَ وَٱللَّهُ مَعَكُمۡ وَلَن یَتِرَكُمۡ أَعۡمَـٰلَكُمۡ

    फ़ला तहिनुआ वतदुआ इला अस-सल्मि और तुम अल आ'लाउन वल्लाहु माअकुम वेलन यतेरकुम अआमालुकुम

    और (दुशमनों को)े सुलह की दावत न दो तुम ग़ालिब हो ही और ख़ुदा तो तुम्हारे साथ है और हरगिज़ तुम्हारे आमाल (के सवाब को कम न करेगा)

  36. 36 إِنَّمَا ٱلۡحَیَوٰةُ ٱلدُّنۡیَا لَعِبࣱ وَلَهۡوࣱۚ وَإِن تُؤۡمِنُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ یُؤۡتِكُمۡ أُجُورَكُمۡ وَلَا یَسۡـَٔلۡكُمۡ أَمۡوَ ٰ⁠لَكُمۡ

    अल-हयातु दुनिया लैब वा-इन तुमिनु वतत्तक़ुआ यू'तिकुम उजुराकुम यसअलुकुम अम्वा विश्वास लकुम

    दुनियावी ज़िन्दगी तो बस खेल तमाशा है और अगर तुम (ख़ुदा पर) ईमान रखोगे और परहेज़गारी करोगे तो वह तुमको तुम्हारे अज्र इनायत फरमाएगा और तुमसे तुम्हारे माल नहीं तलब करेगा

  37. 37 إِن یَسۡـَٔلۡكُمُوهَا فَیُحۡفِكُمۡ تَبۡخَلُوا۟ وَیُخۡرِجۡ أَضۡغَـٰنَكُمۡ

    इन यसअलुकुमुहा फ़युह्फिकुम तबख़लू वयुख्रिज अज़्ग़ानकुम

    और अगर वह तुमसे माल तलब करे और तुमसे चिमट कर माँगे भी तो तुम (ज़रूर) बुख्ल करने लगो

  38. 38 هَـٰۤأَنتُمۡ هَـٰۤؤُلَاۤءِ تُدۡعَوۡنَ لِتُنفِقُوا۟ فِی سَبِیلِ ٱللَّهِ فَمِنكُم مَّن یَبۡخَلُۖ وَمَن یَبۡخَلۡ فَإِنَّمَا یَبۡخَلُ عَن نَّفۡسِهِۦۚ وَٱللَّهُ ٱلۡغَنِیُّ وَأَنتُمُ ٱلۡفُقَرَاۤءُۚ وَإِن تَتَوَلَّوۡا۟ یَسۡتَبۡدِلۡ قَوۡمًا غَیۡرَكُمۡ ثُمَّ لَا یَكُونُوۤا۟ أَمۡثَـٰلَكُم

    हाअंतुम हाउलाए तुदऔन लेतुन्फिकु फ़े सबील अल्लाह मेन यबख़लु वमन यबख़ल फाइन्नामा अन नफ़्सिहि वल्लाहु अल ग़नी और तुम अल-फुकरा वा-इन ततावल्ला यस्तब्दिल कौमा ग़ैर-कुम सुम्म

    और ख़ुदा तो तुम्हारे कीने को ज़रूर ज़ाहिर करके रहेगा देखो तुम लोग वही तो हो कि ख़ुदा की राह में ख़र्च के लिए बुलाए जाते हो तो बाज़ तुम में ऐसे भी हैं जो बुख्ल करते हैं और (याद रहे कि) जो बुख्ल करता है तो ख़ुद अपने ही से बुख्ल करता है और ख़ुदा तो बेनियाज़ है और तुम (उसके) मोहताज हो और अगर तुम (ख़ुदा के हुक्म से) मुँह फेरोगे तो ख़ुदा (तुम्हारे सिवा) दूसरों बदल देगा और वह तुम्हारे ऐसे (बख़ील) न होंगे

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