Qaaf
क़ाफ़
क़ाफ़
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ
बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम
- 1 قۤۚ وَٱلۡقُرۡءَانِ ٱلۡمَجِیدِ
क़ाफ वल कुरआन अल-मजीद
क़ाफ़ क़ुरान मजीद की क़सम (मोहम्मद पैग़म्बर हैं)
- 2 بَلۡ عَجِبُوۤا۟ أَن جَاۤءَهُم مُّنذِرࣱ مِّنۡهُمۡ فَقَالَ ٱلۡكَـٰفِرُونَ هَـٰذَا شَیۡءٌ عَجِیبٌ
अजिबुआ अन जाआहुम मुन्ज़िर मिन्हुम फ़काला अल-काफिरून हाज़ा शैन अजीब
लेकिन इन (काफिरों) को ताज्जुब है कि उन ही में एक (अज़ाब से) डराने वाला (पैग़म्बर) उनके पास आ गया तो कुफ्फ़ार कहने लगे ये तो एक अजीब बात है
- 3 أَءِذَا مِتۡنَا وَكُنَّا تُرَابࣰاۖ ذَ ٰلِكَ رَجۡعُۢ بَعِیدࣱ
अइज़ा मेतना वा कुन्ना ज़ा विश्वास लेका रजउ बईद
भला जब हम मर जाएँगे और (सड़ गल कर) मिटटी हो जाएँगे तो फिर ये दोबार ज़िन्दा होना (अक्ल से) बईद (बात है)
- 4 قَدۡ عَلِمۡنَا مَا تَنقُصُ ٱلۡأَرۡضُ مِنۡهُمۡۖ وَعِندَنَا كِتَـٰبٌ حَفِیظُۢ
क़द अलिम्ना तन्कुपु अल-अर्द वा एदना किताबुन हाफ़िज़
उनके जिस्मों से ज़मीन जिस चीज़ को (खा खा कर) कम करती है वह हमको मालूम है और हमारे पास तो तहरीरी याददाश्त किताब लौहे महफूज़ मौजूद है
- 5 بَلۡ كَذَّبُوا۟ بِٱلۡحَقِّ لَمَّا جَاۤءَهُمۡ فَهُمۡ فِیۤ أَمۡرࣲ مَّرِیجٍ
कज़्ज़ाबू बिल-हक्की लम्मा अम्र मरीजीन
मगर जब उनके पास दीन (हक़) आ पहुँचा तो उन्होने उसे झुठलाया तो वह लोग एक ऐसी बात में उलझे हुए हैं जिसे क़रार नहीं
- 6 أَفَلَمۡ یَنظُرُوۤا۟ إِلَى ٱلسَّمَاۤءِ فَوۡقَهُمۡ كَیۡفَ بَنَیۡنَـٰهَا وَزَیَّنَّـٰهَا وَمَا لَهَا مِن فُرُوجࣲ
अफ़लम यान्ज़ुरु इला अस-समा फौकहुम कैफ़ा बनयनाहा वज़य्यन्नाहा वमा लहा मिन फ़ुरोज
तो क्या इन लोगों ने अपने ऊपर आसमान की नज़र नहीं की कि हमने उसको क्यों कर बनाया और उसको कैसी ज़ीनत दी और उनसे कहीं शिगाफ्त तक नहीं
- 7 وَٱلۡأَرۡضَ مَدَدۡنَـٰهَا وَأَلۡقَیۡنَا فِیهَا رَوَ ٰسِیَ وَأَنۢبَتۡنَا فِیهَا مِن كُلِّ زَوۡجِۭ بَهِیجࣲ
वल अर्द मदनाहा वा अल्कैना फ़िहा रवा विश्वास सेया और हमने उगाया फ़िहा मिन कुल्लि ज़ौजि बहिज
और ज़मीन को हमने फैलाया और उस पर बोझल पहाड़ रख दिये और इसमें हर तरह की ख़ुशनुमा चीज़ें उगाई ताकि तमाम रूजू लाने वाले
- 8 تَبۡصِرَةࣰ وَذِكۡرَىٰ لِكُلِّ عَبۡدࣲ مُّنِیبࣲ
तब्सिरा वज़िक्रा ले कुल अब्द मुनीबिन
(बन्दे) हिदायत और इबरत हासिल करें
- 9 وَنَزَّلۡنَا مِنَ ٱلسَّمَاۤءِ مَاۤءࣰ مُّبَـٰرَكࣰا فَأَنۢبَتۡنَا بِهِۦ جَنَّـٰتࣲ وَحَبَّ ٱلۡحَصِیدِ
वा नज़्ज़ल्ना मिन अस-समा मा मुबारक फ़ाअन्ब्तना बेहि वहब्बा अल-हसीदी
और हमने आसमान से बरकत वाला पानी बरसाया तो उससे बाग़ (के दरख्त) उगाए और खेती का अनाज और लम्बी लम्बी खजूरें
- 10 وَٱلنَّخۡلَ بَاسِقَـٰتࣲ لَّهَا طَلۡعࣱ نَّضِیدࣱ
वल-नख़्ला बासिकात ल्लाहा तलउन नज़ीद
जिसका बौर बाहम गुथा हुआ है
- 11 رِّزۡقࣰا لِّلۡعِبَادِۖ وَأَحۡیَیۡنَا بِهِۦ بَلۡدَةࣰ مَّیۡتࣰاۚ كَذَ ٰلِكَ ٱلۡخُرُوجُ
रिज़्क लिल इबाद वा-अह्य-य-ना बेहि बल्दा मैत कज़ा विश्वास लेका अल-खुरूज
(ये सब कुछ) बन्दों की रोज़ी देने के लिए (पैदा किया) और पानी ही से हमने मुर्दा शहर (उफ़तादा ज़मीन) को ज़िन्दा किया
- 12 كَذَّبَتۡ قَبۡلَهُمۡ قَوۡمُ نُوحࣲ وَأَصۡحَـٰبُ ٱلرَّسِّ وَثَمُودُ
कज़़्ज़़बत क़बलहुम क़ौम वा अशाब अर-रस सामूद
इसी तरह (क़यामत में मुर्दों को) निकलना होगा उनसे पहले नूह की क़ौम और ख़न्दक़ वालों और (क़ौम) समूद ने अपने अपने पैग़म्बरों को झुठलाया
- 13 وَعَادࣱ وَفِرۡعَوۡنُ وَإِخۡوَ ٰنُ لُوطࣲ
वअद फ़िरऔन वा इख्वा विश्वास नु
और (क़ौम) आद और फिरऔन और लूत की क़ौम
- 14 وَأَصۡحَـٰبُ ٱلۡأَیۡكَةِ وَقَوۡمُ تُبَّعࣲۚ كُلࣱّ كَذَّبَ ٱلرُّسُلَ فَحَقَّ وَعِیدِ
वा अशाब अल-अय्कति वकौम तुब्बाए कुल्ल कज़्ज़ब अल-रुसुल फहक वईद
और बन के रहने वालों (क़ौम शुऐब) और तुब्बा की क़ौम और (उन) सबने अपने (अपने) पैग़म्बरों को झुठलाया तो हमारा (अज़ाब का) वायदा पूरा हो कर रहा
- 15 أَفَعَیِینَا بِٱلۡخَلۡقِ ٱلۡأَوَّلِۚ بَلۡ هُمۡ فِی لَبۡسࣲ مِّنۡ خَلۡقࣲ جَدِیدࣲ
अफ़ायिना बिल ख़ल्क़ि अल-अव्वली हुम फ़े लब्स ख़ल्क जदीद
तो क्या हम पहली बार पैदा करके थक गये हैं (हरगिज़ नहीं) मगर ये लोग अज़ सरे नौ (दोबारा) पैदा करने की निस्बत शक़ में पड़े हैं
- 16 وَلَقَدۡ خَلَقۡنَا ٱلۡإِنسَـٰنَ وَنَعۡلَمُ مَا تُوَسۡوِسُ بِهِۦ نَفۡسُهُۥۖ وَنَحۡنُ أَقۡرَبُ إِلَیۡهِ مِنۡ حَبۡلِ ٱلۡوَرِیدِ
व-लक्द ख़लक़ना अल-इंसान वना'ल्मु तोउसुइसु बेहि नफ़्सुहु वा नह्नु अकराबु इलायहि हब्ल अल-वरीद
और बेशक हम ही ने इन्सान को पैदा किया और जो ख्यालात उसके दिल में गुज़रते हैं हम उनको जानते हैं और हम तो उसकी शहरग से भी ज्यादा क़रीब हैं
- 17 إِذۡ یَتَلَقَّى ٱلۡمُتَلَقِّیَانِ عَنِ ٱلۡیَمِینِ وَعَنِ ٱلشِّمَالِ قَعِیدࣱ
इज़् यतलक़्क़ा अल-मुतलक्कियान अने अल-यमीन वअनि अश-शिमाली क़ायद
जब (वह कोई काम करता हैं तो) दो लिखने वाले (केरामन क़ातेबीन) जो उसके दाहिने बाएं बैठे हैं लिख लेते हैं
- 18 مَّا یَلۡفِظُ مِن قَوۡلٍ إِلَّا لَدَیۡهِ رَقِیبٌ عَتِیدࣱ
मा याल्फिज़ु मिन कौल इल्ला लदयहि रक़ीबुन अतीद
कोई बात उसकी ज़बान पर नहीं आती मगर एक निगेहबान उसके पास तैयार रहता है
- 19 وَجَاۤءَتۡ سَكۡرَةُ ٱلۡمَوۡتِ بِٱلۡحَقِّۖ ذَ ٰلِكَ مَا كُنتَ مِنۡهُ تَحِیدُ
वजायत सक्रतु अल मौत ज़ा विश्वास लेका कोंता मिन्हु तहीद
मौत की बेहोशी यक़ीनन तारी होगी (जो हम बता देंगे कि) यही तो वह (हालात है) जिससे तू भागा करता था
- 20 وَنُفِخَ فِی ٱلصُّورِۚ ذَ ٰلِكَ یَوۡمُ ٱلۡوَعِیدِ
वनुफेख फ़े ज़ा विश्वास लेका यौम अल-वअईद
और सूर फूँका जाएगा यही (अज़ाब) के वायदे का दिन है और हर शख़्श (हमारे सामने) (इस तरह) हाज़िर होगा
- 21 وَجَاۤءَتۡ كُلُّ نَفۡسࣲ مَّعَهَا سَاۤىِٕقࣱ وَشَهِیدࣱ
वजायत कुल्लु नफ़्स माआहा साइक़ वशहीद
कि उसके साथ एक (फरिश्ता) हॅका लाने वाला होगा
- 22 لَّقَدۡ كُنتَ فِی غَفۡلَةࣲ مِّنۡ هَـٰذَا فَكَشَفۡنَا عَنكَ غِطَاۤءَكَ فَبَصَرُكَ ٱلۡیَوۡمَ حَدِیدࣱ
लाकद कोंता फ़े ग़फ़्लत हाज़ा फकश्फना अनक ग़ितआका फ़बसरुक अल-यौम हदीद
और एक (आमाल का) गवाह उससे कहा जाएगा कि उस (दिन) से तू ग़फ़लत में पड़ा था तो अब हमने तेरे सामने से पर्दे को हटा दिया तो आज तेरी निगाह बड़ी तेज़ है
- 23 وَقَالَ قَرِینُهُۥ هَـٰذَا مَا لَدَیَّ عَتِیدٌ
व काला क़रीनुहू हाज़ा लदय्य अतीदुन
और उसका साथी (फ़रिश्ता) कहेगा ये (उसका अमल) जो मेरे पास है
- 24 أَلۡقِیَا فِی جَهَنَّمَ كُلَّ كَفَّارٍ عَنِیدࣲ
अल-किया फ़े जहन्नम कुल्ला कफ़्फ़ार अनीद
(तब हुक्म होगा कि) तुम दोनों हर सरकश नाशुक्रे को दोज़ख़ में डाल दो
- 25 مَّنَّاعࣲ لِّلۡخَیۡرِ مُعۡتَدࣲ مُّرِیبٍ
मनाआ लिल-खैर मुआ'तद मुरीबीन
जो (वाजिब हुकूक से) माल में बुख्ल करने वाला हद से बढ़ने वाला (दीन में) शक़ करने वाला था
- 26 ٱلَّذِی جَعَلَ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ فَأَلۡقِیَاهُ فِی ٱلۡعَذَابِ ٱلشَّدِیدِ
अल्लाज़ी जाला माआ अल्लाह इलाहान फ़ाल्कियाह फ़े अल-अज़ाबि अश-शदीद
जिसने ख़ुदा के साथ दूसरे माबूद बना रखे थे तो अब तुम दोनों इसको सख्त अज़ाब में डाल ही दो
- 27 ۞ قَالَ قَرِینُهُۥ رَبَّنَا مَاۤ أَطۡغَیۡتُهُۥ وَلَـٰكِن كَانَ فِی ضَلَـٰلِۭ بَعِیدࣲ
क़ाला क़रीनुहू मा अतग़ैतुहु वलाकिन काना फ़े ज़लाल
(उस वक्त) उसका साथी (शैतान) कहेगा परवरदिगार हमने इसको गुमराह नहीं किया था बल्कि ये तो ख़ुद सख्त गुमराही में मुब्तिला था
- 28 قَالَ لَا تَخۡتَصِمُوا۟ لَدَیَّ وَقَدۡ قَدَّمۡتُ إِلَیۡكُم بِٱلۡوَعِیدِ
क़ाला तख़्तसिपमु लदय्य वक़िद क़दमतु बिलवईदी
इस पर ख़ुदा फ़रमाएगा हमारे सामने झगड़े न करो मैं तो तुम लोगों को पहले ही (अज़ाब से) डरा चुका था
- 29 مَا یُبَدَّلُ ٱلۡقَوۡلُ لَدَیَّ وَمَاۤ أَنَا۠ بِظَلَّـٰمࣲ لِّلۡعَبِیدِ
युबद्दलु अल क़ौलु लदय्य अना बेज़ल्लाम लिल-अबीद
मेरे यहाँ बात बदला नहीं करती और न मैं बन्दों पर (ज़र्रा बराबर) ज़ुल्म करने वाला हूँ
- 30 یَوۡمَ نَقُولُ لِجَهَنَّمَ هَلِ ٱمۡتَلَأۡتِ وَتَقُولُ هَلۡ مِن مَّزِیدࣲ
यौम ले जहन्नम हलि इम्तेलाति वतक़ुलु हल मिन मज़ीद
उस दिन हम दोज़ख़ से पूछेंगे कि तू भर चुकी और वह कहेगी क्या कुछ और भी हैं
- 31 وَأُزۡلِفَتِ ٱلۡجَنَّةُ لِلۡمُتَّقِینَ غَیۡرَ بَعِیدٍ
वा उज़्लिफ़ति अल जन्नतु लिल मुत्तक़ीन ग़ैर बईद
और बेहिश्त परहेज़गारों के बिलकुल करीब कर दी जाएगी
- 32 هَـٰذَا مَا تُوعَدُونَ لِكُلِّ أَوَّابٍ حَفِیظࣲ
हाज़ा तुआदूनों ले कुल अव्वाबिन हाफ़िज़
यही तो वह बेहिश्त है जिसका तुममें से हर एक (ख़ुदा की तरफ़) रूजू करने वाले (हुदूद की) हिफाज़त करने वाले से वायदा किया जाता है
- 33 مَّنۡ خَشِیَ ٱلرَّحۡمَـٰنَ بِٱلۡغَیۡبِ وَجَاۤءَ بِقَلۡبࣲ مُّنِیبٍ
ख़शिया अर-रहमान बिलग़ैबि वजा बेक़ल्ब मुनीबिन
तो जो शख़्श ख़ुदा से बे देखे डरता रहा और ख़ुदा की तरफ़ रूजू करने वाला दिल लेकर आया
- 34 ٱدۡخُلُوهَا بِسَلَـٰمࣲۖ ذَ ٰلِكَ یَوۡمُ ٱلۡخُلُودِ
उधुलुहा बिसलाम ज़ा विश्वास लेका यौम अल-खुलूद
(उसको हुक्म होगा कि) इसमें सही सलामत दाख़िल हो जाओ यहीं तो हमेशा रहने का दिन है
- 35 لَهُم مَّا یَشَاۤءُونَ فِیهَا وَلَدَیۡنَا مَزِیدࣱ
मा यशाऊन फ़िहा वलदैना मज़ीद
इसमें ये लोग जो चाहेंगे उनके लिए हाज़िर है और हमारे यहॉ तो इससे भी ज्यादा है
- 36 وَكَمۡ أَهۡلَكۡنَا قَبۡلَهُم مِّن قَرۡنٍ هُمۡ أَشَدُّ مِنۡهُم بَطۡشࣰا فَنَقَّبُوا۟ فِی ٱلۡبِلَـٰدِ هَلۡ مِن مَّحِیصٍ
मिन क़र्न हुम अशद्दु बत्श फ़नक़बू फ़े अल-बिलाद हल मिन माहिस
और हमने तो इनसे पहले कितनी उम्मतें हलाक कर डाली जो इनसे क़ूवत में कहीं बढ़ कर थीं तो उन लोगों ने (मौत के ख़ौफ से) तमाम शहरों को छान मारा कि भला कहीं भी भागने का ठिकाना है
- 37 إِنَّ فِی ذَ ٰلِكَ لَذِكۡرَىٰ لِمَن كَانَ لَهُۥ قَلۡبٌ أَوۡ أَلۡقَى ٱلسَّمۡعَ وَهُوَ شَهِیدࣱ
इन्ना फ़े ज़ा विश्वास लेका लज़िक्रा काना क़ल्ब औ अल-क़ा-या अस-समआ वहुव शहीद
इसमें शक़ नहीं कि जो शख़्श (आगाह) दिल रखता है या कान लगाकर हुज़ूरे क़ल्ब से सुनता है उसके लिए इसमें (काफ़ी) नसीहत है
- 38 وَلَقَدۡ خَلَقۡنَا ٱلسَّمَـٰوَ ٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ وَمَا بَیۡنَهُمَا فِی سِتَّةِ أَیَّامࣲ وَمَا مَسَّنَا مِن لُّغُوبࣲ
व-लक्द ख़लक़ना अस-समावा विश्वास ते वल अर्द वमा बय्नहुमा फ़े सेत्ता अय्याम वमा मसना मिन लुगूब
और हमने ही यक़ीनन सारे आसमान और ज़मीन और जो कुछ उन दोनों के बीच में है छह: दिन में पैदा किए और थकान तो हमको छुकर भी नहीं गयी
- 39 فَٱصۡبِرۡ عَلَىٰ مَا یَقُولُونَ وَسَبِّحۡ بِحَمۡدِ رَبِّكَ قَبۡلَ طُلُوعِ ٱلشَّمۡسِ وَقَبۡلَ ٱلۡغُرُوبِ
फ़ास्बिर अला याक़ुलून व सब्बिह बेहम्दि रब्बिक क़िबला तुलुई अश-शम्सि वक़बल अल-ग़ुरूब
तो (ऐ रसूल) जो कुछ ये (काफ़िर) लोग किया करते हैं उस पर तुम सब्र करो और आफ़ताब के निकलने से पहले अपने परवरदिगार के हम्द की तस्बीह किया करो
- 40 وَمِنَ ٱلَّیۡلِ فَسَبِّحۡهُ وَأَدۡبَـٰرَ ٱلسُّجُودِ
वोमेन अल-लैल फसब्बिहु वा अदबारा अस-सुजूदि
और थोड़ी देर रात को भी और नमाज़ के बाद भी उसकी तस्बीह करो
- 41 وَٱسۡتَمِعۡ یَوۡمَ یُنَادِ ٱلۡمُنَادِ مِن مَّكَانࣲ قَرِیبࣲ
वस्तम यौम युनादे अल्मुनादी मिन मकान क़रीब
और कान लगा कर सुन रखो कि जिस दिन पुकारने वाला (इसराफ़ील) नज़दीक ही जगह से आवाज़ देगा
- 42 یَوۡمَ یَسۡمَعُونَ ٱلصَّیۡحَةَ بِٱلۡحَقِّۚ ذَ ٰلِكَ یَوۡمُ ٱلۡخُرُوجِ
यौम यास्मऊन अस-सैहा ज़ा विश्वास लेका यौम अल-खुरूज
(कि उठो) जिस दिन लोग एक सख्त चीख़ को बाख़ूबी सुन लेगें वही दिन (लोगों) के कब्रों से निकलने का होगा
- 43 إِنَّا نَحۡنُ نُحۡیِۦ وَنُمِیتُ وَإِلَیۡنَا ٱلۡمَصِیرُ
नह्नु नुहयी उनेमितु वा इलैना अलमासिरु
बेशक हम ही (लोगों को) ज़िन्दा करते हैं और हम ही मारते हैं
- 44 یَوۡمَ تَشَقَّقُ ٱلۡأَرۡضُ عَنۡهُمۡ سِرَاعࣰاۚ ذَ ٰلِكَ حَشۡرٌ عَلَیۡنَا یَسِیرࣱ
यौम तशक्कुकु अल-अर्द अन्हुम ज़ा विश्वास लेका हश्र अलैना
और हमारी ही तरफ फिर कर आना है जिस दिन ज़मीन (उनके ऊपर से) फट जाएगी और ये झट पट निकल खड़े होंगे ये उठाना और जमा करना
- 45 نَّحۡنُ أَعۡلَمُ بِمَا یَقُولُونَۖ وَمَاۤ أَنتَ عَلَیۡهِم بِجَبَّارࣲۖ فَذَكِّرۡ بِٱلۡقُرۡءَانِ مَن یَخَافُ وَعِیدِ
नह्नु अ'लामु बिमा अन्त बेजब्बार फ़ज़्किर बिल-कुरआन मैन यखाफ़ु वईद
और हम पर बहुत आसान है (ऐ रसूल) ये लोग जो कुछ कहते हैं हम (उसे) ख़ूब जानते हैं और तुम उन पर जब्र तो देते नहीं हो तो जो हमारे (अज़ाब के) वायदे से डरे उसको तुम क़ुरान के ज़रिए नसीहत करते रहो
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